यह सुख की बात है

 

यह सुख की बात है

यह सुख की बात है


चलते चलते आगया हूं,

जिन्दगीकी दोछकि पर,

आज है मन अथय,निरंतर

समझ नहीं आता जाऊं किधर

संदेह मनमें श्रम तो होनाजाए बेकार,

समझनेको प्रयास करता बारबार,

लेकिन होतानेहीं सदा चंचल मन,

भागता जाता प्रबल बेग में इधर उधर,

मैं हूं हैरान,कभी निचेतो कभी ऊपर,

देखता रहता केवल चिन्तामग्न बनकर।


कबतग ऐसे भागता रहूं आशाके पीछे,

क्या निचिंतता है,सपनें होंगे ही सच

बास्तबता से कबतग ऐसे भागता रहूं,

ब्यबधान आकाश और धरती जैसे,

अनेक शून्यता है इनके अंदर ये जानकर,

थोड़ीसी हिचकिचाहट जरू आता मन में,

फिर भी मै हूं नहीं संकाकुल,दिलकी अंदर।


पता है मुझे मुसीबत से भागना हार है,

जो मैं कतई नहीं नहीं स्वीकारता, लड़ता

अछि तरह जानता हार भी यहां जीत होता

मन में कभी दुःख नहीं होता जो बिजिगिसा

अपनिआप आजाता पर्याप्त बल लड़नेकी

सचेतित करता अस्तित्व बजाय की तरफ,

उसे स्वीकारता अपनी आपको खड़ा करता

वहीं पे ही मेरा सारि दुर्बलता गायब होजाता 

मुझे जिसके पीछे केवल शुखही सुख दिखता। 




टिप्पणियाँ